Saturday, 21 April 2012

बारिश ...

नन्ह्नी- नन्ह्नी  जल की बूंदे
   जब जमीन पर आती है ,
गिरती है धरती की गोद मै, 
     कुछ डरती कुछ घबराती है.
समझ ना पाती कहा आगाये ,
     कैसे जीवन बिताना है?
आना है किसी और के काम या,
     वापस बदली बन जाना है.
कंही खिलाती कोपल नई 
   कंही जीवन को जिलाती है ,
कभी भारती पेट गरीब का 
    कभी ऊष्मा मिटाती है.
नन्ही बूंदे आती है, डरती है, घबराती  है .

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